कान्हा रे मनमोहन लाल । सब ही बिसरूं देखें गोपाल ॥ध्रु.॥
काहां पग डारूं देख आनेरा । देखें तों सब वोहिन घेरा ॥२॥
हुं तों थकित भैर तुका । भागा रे सब मनका धोका ॥३॥
१. “मैं भुली घरजानी बाट । गोरस बेचन आयें हाट ॥”
इस पंक्ति में भक्त स्वयं को एक साधारण ग्रामीण स्त्री के रूप में देखती है, जो दूध-मक्खन (गोरस) बेचने बाज़ार यानी “हाट” आई है।
वह कहती है कि मैं तो अपने घर की राह भी भूल गई हूँ। यानी मैं इतनी खो गई हूँ, इतनी भावविह्वल हूँ कि मुझे अपने घर की दिशा भी याद नहीं रही।
“घरजानी बाट” का अर्थ है घर की पहचानने योग्य राह।
“भुली” से तात्पर्य सिर्फ भौतिक रास्ता भूलना नहीं है, बल्कि मैं तो संसार का रास्ता भी भूल गई हूँ। मेरा चित्त ऐसे भाव में बह गया है कि दुनिया की याद, दायित्व, काम-धंधा सब गौण बन गए हैं।
जब भक्त का मन ईश्वर की ओर एकाग्र हो जाता है, तब वह जीवन की सामान्य व्यस्तताओं को पीछे छोड़ देता है। यहाँ वही दशा दिखाई देती है
“मैं गृहस्थी की राह भूल गई हूँ; मेरा उद्देश्य गोरस बेचने आया था, पर मन तो कहीं और ही लग गया है।”
यह संकेत करता है कि भक्ति में डूबा मन सांसारिक काम करते हुए भी भीतर से ईश्वर में ही लीन रहता है।
ध्रुवपद “कान्हा रे मनमोहन लाल । सब ही बिसरूं देखें गोपाल ।”
यहाँ भक्त सीधे कृष्ण को संबोधित करती है
“हे कान्हा! हे मनमोहन लाल! जैसे ही तुम्हें देखती हूँ, सब कुछ भूल जाती हूँ घर, संसार, काम, बाज़ार, मैं कौन हूँ सब!”
कृष्ण को ‘मनमोहन’, अर्थात मन को मोह लेने वाला कहा गया है।
उनकी एक झलक ही मन को इतनी गहराई तक छू लेती है कि बाकी सब व्यर्थ लगने लगता है।
“सब ही बिसरूं” का अर्थ है मैं संसार की हर चीज़ भुला देती हूँ।
भक्त गोपाल के सौंदर्य, बालपन, स्नेह, कृपा में खो जाती है।
यह उसी बाल गोपाल की अनुभूति है जिसे देखकर ग्वालिनें, गोपियाँ, नंदगाँव के लोग सब कुछ भूल जाते थे।
भक्ति में यही शक्ति हैवह मन को मोहन के चरणों में बाँध देती है।
२. “काहां पग डारूं देख आनेरा । देखें तों सब वोहिन घेरा ॥”
भक्त कहती है
“मैं पाँव कहाँ रखूँ? किस दिशा में चलूँ? सामने देखने पर मुझे तो हर तरफ वही दिखाई देते हैं कान्हा ही कान्हा!”
“वोहिन घेरा” अर्थात् हर तरफ कान्हा का घेरा, उनका प्रकाश, उनका स्वरूप, उनकी छवि।
यह सूफी, भक्तिकाल, और वेदांत, तीनों में पढ़ते हैं
जिसे भगवान का साक्षात अनुभव होता है, उसे हर दिशा में वही दिखाई देते हैं।
यह बताता है कि भक्त का मन कान्हा में इतना लीन है कि उसे कान्हा के सिवा कोई दूसरा अस्तित्व दिखता ही नहीं।
- यह आध्यात्मिक एकता का भाव है।
- यह भक्ति की पराकाष्ठा है, जहाँ दृष्टि बदल जाती है।
- यह चित्त की वह स्थिति है जहाँ संसार की आकृतियाँ मिटकर ईश्वर का एक ही रूप व्यापने लगता है।
इस पंक्ति में भक्ति का अद्वैत भाव प्रकट होता है
“कहीं देखूँ तो कुछ दिखता नहीं; बस मोहन ही मोहन हैं।”
३. “हुं तों थकित भैर तुका । भागा रे सब मनका धोका ॥”
यहाँ भक्त कहती है
“मैं तो थक गई हूँ तुझको पुकारते-पुकारते, तुम्हारी खोज में दौड़ते-दौड़ते। लेकिन अब मन के सारे भ्रम, सारे धोखे, सारी माया सब भाग गए।”
“थकित भैर” का मतलब है शारीरिक थकान नहीं, बल्कि व्याकुलता, तड़प, लालसा में थक जाना।
जब कोई प्रेमी अपने प्रिय की खोज करता है, तो वह व्याकुल होकर थक जाता है।
भक्त की स्थिति भी वैसी ही है कान्हा के लिए तड़प, आँसू, पुकार, भक्ति का ताप।
लेकिन इस थकान के बाद जो प्राप्त होता है, वह बहुत महान है
“भागा रे सब मनका धोका।”
अर्थात् मन के भ्रम, मोह, आसक्ति, लालच, भय यह सब हट गया।
क्यों?
क्योंकि भीतर कृष्ण का प्रकाश उतर आया।
जब हृदय में कृष्ण प्रवेश कर जाते हैं, तब मन की सभी व्यर्थ दौड़ समाप्त हो जाती है।
यह पंक्ति बताती है कि प्रेम और भक्ति की तड़प के बाद मन शुद्ध हो जाता है।
सांसारिक माया और भ्रम मिट जाते हैं।
भक्त की चेतना कृष्ण में स्थिर हो जाती है।
समग्र भाव-सार
पूरा पद एक साधारण ग्रामीण स्त्री के रूप में कृष्ण के प्रति प्रेम और साक्षात्कार की कथा है।
वह बाज़ार आई थी कुछ बेचने, पर कृष्ण की झलक ने उसे जीवन का रास्ता ही भुला दिया।
कान्हा का दर्शन होता है, और वह सब भूलकर उनमें लीन हो जाती है।
अंततः भक्त कहती है
“मेरे मन के सारे भ्रम दूर हो गए; अब मेरे लिए केवल तू है, कान्हा!”

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